Monday, October 13, 2014

बातें 'सत्यकाम' की


कुछ कहानियाँ , कुछ कविताएँ , कुछ गीत , हमारे भीतर कभी ख़त्म नहीं होते। वो जैसे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं , कभी प्रेरणा बन कर , कभी कोई याद बन कर , और , कभी चाह कर भी,  कुछ न कर पाने की व्यथा से जनित पीड़ा बन कर।

1969 में ऋषिकेश मुख़र्जी ने नैतिकता , ईमानदारी और सच्चाई को आधार बनाकर इस ख़ूबसूरत फ़िल्म सत्यकाम की रचना की थी। फिल्म में आदर्शवाद के दुर्गम राहों की तकलीफो का जिक्र भी था और व्यहारिकता की पतली गलियों की फिसलती  ढलानों पर एक तंज़ भी। ये कृति एक सवेंदनशील हृदय के लिए गहन सोच का सामान थी। आश्चर्य की बात नहीं कि  नैतिकता और सच्चाई  का ढोल पीटने वाले हमारे समाज ने इस फ़िल्म को ठीक से देखने की कोशिश तक नहीं की , नतीज़न  फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही।

संजीव कुमार यानी नरेन सूत्राधार हैं  पूरी कहानी के , जो केंद्रित है उनके मित्र सत्यप्रिय आचार्य यानी धर्मेन्द्र पर, जिसका सत्य के प्रति समर्पण और आचरण की शुद्धता दीवानगी की हद तक है। यह एक ऐसे इंजीनियर की कहानी है जो भ्रष्ट सिस्टम को दोष देकर अपनी जिमेदारी से मुक्त नहीं होना चाहता . यह दास्ताँ एक ऐसे अधिकारी की, जो नौकरी से इस अहसास से त्यागपत्र दे देता है कि जब वो अपने मातहतों को न्याय नहीं दिला सकता, तो उन्हें सजा देने का भी उसे कोई हक़ नहीं।

व्यहारिकता के नाम पर भ्रष्टाचार की जड़ें सींचने वाले इस समाज में जिस तरह आज भी एक ईमानदार आदमी को मूर्ख और अड़ियल घोषित कर , तबादलों की यातना देकर या फिर अंत में गोलियों की बौछार से शांत किया जाता है, वही हश्र इस सत्यप्रिय आचार्य का भी फ़िल्म में होता है। वह सच्चाई के लिए लड़ते-भिड़ते आख़िर कैंसर का शिकार हो जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शायद कथा लेखक कहना चाहते थे कि भ्रष्टाचार बहुत बड़ा कैंसर है जो इंसानी ईमान को या फिर इंसान को ही खा जाता है। फिल्म के प्रदर्शन  के बाद जब एक पत्रकार ने ऋषिदा से पुछा की उन्होंने आखिर में सत्यप्रिय को मार क्यों दिया ? उनका जवाब था " क्या आपको लगता है आज के समाज में सत्यप्रिय जैसे लोग जीवित रह सकते हैं ? इस उत्तर से उठे सवाल का जवाब तो आज ४४ साल बाद भी हम नहीं ढूंढ पाएं है.

फ़िल्म का प्रारम्भ और और अंत सत्य की गूढ़ परिभाषा से ही होता है , फिल्म की शुरुआत इस पौराणिक कहानी से होती है।
"सत्यकाम ने गुरु गौतम के पास जाकर कहा : भगवन मुझे अपना शिष्य बनाइए।
गुरु गौतम ने पूछा : तुम्हारा गोत्र क्या है ?
सत्यकाम ने कहा : मां से मैंने पूछा था। मां ने कहा बहुतों की सेवा करके तुम्हें पाया। इसलिए तुम्हारे पिता का नाम मैं नहीं जानती। लेकिन मेरा नाम जबाला है इसलिए तुम्हारा नाम जबाल सत्यकाम है। यही कह।
ऋषि गौतम ने सत्यकाम का सिर चूमकर कहा : तुम्ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हो। क्योंकि तुममें सत्य बोलने का साहस है।"

फ़िल्म के अंत में सत्यप्रिय की मृत्यु के बाद दादा (अशोक कुमार) जिसने सत्यप्रिय के विवाह और उसकी पत्नी रंजना के बच्चे को कभी स्वीकार नहीं किया, वह आख़िर में सच की शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाते है। क्योंकि वह बच्चा सार्वजनिक रूप से सामने आकर उनसे कहता है कि वे उसे पिता के संस्कार कर्म से इसलिए दूर रखना चाहते हैं क्योंकि वह उनके पोते का बेटा नहीं है। हैरतज़दा दादाजी अपने भगवा वस्त्रों और लहराती सफ़ेद दाढ़ी में बेचैन होते हुए पूछते हैं कि आख़िर इतने छोटे-से बच्चे को इतना कड़वा सच किसने बताया। बालक कहता है "माँ ने ". सच है , हर युग में मां जबाला और सत्यकाम तो होते ही रहेंगे फिर चाहे दुनिया भले ही उनको उनके सत्य रूप में पहचान पाए कि न पहचान पाए।

पटकथा के साथ इस फिल्म का एक और मजबूत पहलू है, श्री राजेंद्र सिंह बेदी के संजीदा संवाद। ऐसा लगता है, मानो किसी ने हमारे समाज को बेबाकी से सरे बाजार ला दिया है, हिसाब मांगने के लिए । गौर करिये मंत्री के लिखित शिकायत देने की हिदायत पर सत्यप्रिय कहते है "सर , वो लोग क्या लिखकर रिश्वत लेते हैं जो मैं आपको उनके नाम लिखकर दूँ ? कुछ संवाद आपको विश्वास भी दिलाते है कि इंसान अभी भी भरोसे के क़ाबिल हो सकता है जब मत्रीजी घर आ कर कहते है " बेटा , तुम ज़िन्दगी में बहुत दुःख देखोगे , बहुत कुछ सहना पड़ेगा मगर तुम्हारा ये दुःख और दर्द ही हमारी उम्मीद है , जिस पर आने वाली पीड़ी की नीवं रखी जाएगी।  कुछ पैगाम भी दिया है हम सब के लिए बेदीजी  ने ऐसे संवादों में  "मैं इंसान हूं। भगवान की सबसे बड़ी सृष्टि। मैं उसका प्रतिनिधि हूं। किसी अन्याय के साथ कभी सुलह नहीं करूंगा। कभी नहीं करूंगा’।

इस फिल्म को देखकर व्यथित हो जाता हूं, मगर फिर भी इसके अंशों को बार बार देखा है।  इस उम्मीद में कि  जितना कुछ अंदर बच पाया है, कम से कम वही बचा रह जाए। परदे पर ही सही, ऐसे चरित्रों  को देख कर सम्बल और विश्वास  मिलता है कि , इंसान का जीवन यक़ीनन उस बेहूदगी, उस बेचारगी , को पार करने में है, जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है । जो जैसा है, जहां है,  को स्वीकार करने वालों के बहुमत वाली, व्यहारिकता के नश्तरों से, अपनी सुविधा से और अपनी सुविधानुसार सच की कांट छांट  करने वाली, इस स्याह  दुनिया में उन्हीं लोगों की मौजूदगी से उजाला है  जिनके लिए जीवन अपने आदर्शो को जीवित रखने का संघर्ष है। जो लोग  न्याय और अन्याय को बारीकी से पहचानते हैं और न्याय के पक्ष में निर्भीक होकर सच बोल सकते हैं। फिल्म में , सत्यप्रिय के बारे में एक जगह नरेन् का कथन है ‘ऐसा लगता था मानो उसका झगड़ा दुनिया से ही नहीं, ख़ुद से भी है।’ सच है,  और ये भी सच है कि यह सच, सच  की संवेदना और मायने  समझने वाले इंसानो, को ही समझ में आ सकता  है।
महान साहित्यकार गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ का कथन है  " मनुष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही बार उस रोज़ जन्म नहीं लेते जब उनकी माताएं उन्हें पैदा करती हैं,जीवन बार बार उन पर अहसान करता है, कि वे स्वयं को जन्म दें "।हम में से गिने चुने ही  इन अवसरों का उपयोग कर पाते  हैं , और , वो हमेशा जीवित रहते हैं , दूसरों के ख़्वाबों और जज्बों में अपने जीवन से ये पैग़ाम देते हुए
माना की इस चमन को न गुलज़ार कर सके
कुछ खार तो कम कर गए गुज़रे जिधर से हम।  

अगर समय न हो तो मेरे द्वारा upload किया गया  एक अंश देख सकते हैं, यहाँ क्लिक कर के .......

Saturday, September 27, 2014

क्या हो शिक्षा का उधेश्य ?


गूगल व हिंदुस्तान , ने वेब पर हिंदी को बढावा देने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया था | इस प्रतियोगिता के लिए मैंने "शिक्षा : जीवनशैली या व्ययसाय ?" विषय पर यह लेख लिखा था |सौभाग्य से इसे पुरस्कृत  भी किया गया . अब क्योंकि KNOL गूगल द्वारा बंद किया जा रहा है इसे यहाँ पोस्ट कर दिया है |

सवाल से शुरू कर रहा हूँ, क्योंकि, इन सवालों में ही कहीं मेरी अज्ञानता छुपी है, और मेरी अज्ञानता का ज्ञान, मेरी प्रेरणा भी है व मेरे लिए शिक्षा का मूल मंत्र भी | शिक्षा कई रहस्यों से पर्दा हटाती है और इस प्रक्रिया में कई नए प्रश्नों को जन्म भी देती है | किसी भी तरह कि शिक्षा का आधारभूत ध्येय होना चाहिए, व्यक्ति का बौद्धिक विकास, जो एक मानव को प्रश्नों पर सोचने को बाधित करे, जो एक इंसान को तर्क व विचार से निर्णय लेना सिखाये. क्योंकि यह सिर्फ सोच है, जो एक मनुष्य को,एक प्रशिक्षित पशु से अलग करती है| एक शिक्षा पद्धिति  का मूल उधेश्य होना चाहिए,श्रेष्ठ नागरिक और अच्छे इंसान बनाना मगर दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा पद्धिति  केंद्रित है सफल आदमी बनाने में , और बकौल ग़ालिब "आसान नहीं आदमी को भी इंसान होना"|

दृष्टि  घुमाकर देखिये , आपके चारों और आपको अशिक्षित डिग्रीधारी मिल जायेंगे | आज के युवक के वाहन चलाने के तरीके में , उसकी अभिव्यक्ति  ,विचारों और जीवन मूल्यों में आप हमारी शिक्षा पद्दति कि असफलता की  दुर्गन्ध को महसूस कर सकते हैं| जो शिक्षा,  जीवन का पर्याय  सफल होना और सफलता के मायने बस अमीर होना सिखाती हो, वो  हमें मशीनों को चलाने और बेचने वाले हाथ तो दे सकती है मगर उन मशीनों को बनाने वाला दिमाग नहीं दे सकती | हर मनुष्य जन्म से जिज्ञासु  होता है , मगर समय के साथ जिज्ञासा कि इतिश्री होती है, सब कुछ मान लेने के दुर्भाग्य में, या सब कुछ जान लेने के भ्रम में | यहाँ , मस्तिक्ष   की अँधेरी कन्दाओं में उलझे, विचारों के उलटे चमगादड शब्दों के जाल में आंदोलित तो होते हैं मगर उड़ नहीं पाते , और मानव , प्रकर्ति  की सबसे श्रेष्ठ कृति , इन परिस्थितयों के लिए, एक रोबोट कि तरह गलत प्रोग्रामिंग को जिमेदार बनाकर अपने हर कर्त्तव्य से विमुख हो जाता है |

समस्याओं से परे हट समाधान कि तरफ आना चाहूँगा, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट में स्नाकोतर उपाधियाँ लेने के बाद मैं एक शिक्षक हूँ,किसी बाध्यता के कारण नहीं , अपनी मर्जी से,अपनी ख़ुशी से, क्योंकि विद्यार्थियों के बीच बिताये गए घंटे मेरे जीवन को मायने देते हैं | मेरे अवलोकनों , प्रेक्षणों ,प्रयोगों ने जो अनुभव मुझे दिया है उसका निचोड़ ये है कि विषयों को शब्दों के लिए नहीं उनके आशय और अर्थ के लिए पढ़ाने  से लाभ होता है | विज्ञान सुन्दर है क्योंकि यह आपको एक इन्द्रधनुष या एक फूल कि ख़ूबसूरती का कारण समझाता है ,परिभाषाओं के दायरे से बाहर , और अंको और चिन्हों के परिचालन से ऊपर है वो ज्ञान जो किसी, क्यों ? क्या ? और कैसे ? को जन्म देता है | क्षेत्र कला का हो,वाणिज्य या विज्ञान का,  जरूरत है इस जिज्ञासा को जीवित रखने की, जररूत है हर मनुष्य को जीवन भर विद्यार्थी बनाये रखने की , और जरूरत हैं ज्ञान के साथ सवेंदेना को समन्वित करने की| गांधीजी ने भी "मानवता विहीन विज्ञान , अंतरात्मा विहीन आनन्द और चरित्र बिना ज्ञान" को समाज मूल बुराईयो में से बताया था | हमारी जरुरत है उष्मा गतिकी के नियमो के साथ ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को समझने की,व्रतीय गति के नियमों  के साथ अगर एक विद्यार्थी को शिक्षक , तेज़ी से मोड़ मुड़ने पर होने वाले खतरों को नहीं समझा पाए तो शिक्षक इसे अपनी असफलता ही माने | 

शिक्षा एक साझा प्रयास है, जिसे हम विद्यालयों के जिम्मे छोड़ कर मुक्ति नहीं पा सकते | किसी भी शिशु का पहला स्कूल है उसका घर और पहले शिक्षक उसके अभिभावक | एक बालक के अवचेतन मन पर अभिभावकों द्वारा दी गयी सलाह और उससे जनित प्रतिक्रिया उसके स्मृति पटल पर अंकित होती रहती है | एक व्यसक होने पर वो जीवन को अपने अनुभवों के आधार पर देखता है | हर बच्चा अपना जीवन अपने अभिभावकों के प्रति प्रेम से शुरू करता है, बड़ा होने पर वो उन्हें परखता है और कभी-कभी उन्हें क्षमा भी कर पाता है | आपकी प्रतिक्रियाएं , आपका पोषण एक बच्चे  के चरित्र के  निर्माण का खाका खींचते हैं | अपने शिशु  के पहले कदम किसी भी माता के लिए अविस्मर्णीय पल होते हैं।  लेकिन,  जब बालक चलाना सीखते समय गिरता है,  तो सब माताओं की प्रतिक्रिया एक सी नहीं होती | एक माता अपनी जगह खड़े रहकर अपने बालक को खुद तक आने को प्रेरित करती है जब वो बालक अपनी माँ तक पहुँचता है तब ही उसे दुलार मिलता है ऐसा करके उस अबोध के व्यकित्व में माँ एक बीज बोती है,कि किसी भी कार्य को समाप्त करने पर ही पुरुस्कार मिलता है | दूसरी माँ दौड़कर अपने बचे को गोद में उठाती है और जीवन में हमेशा दूसरों से मदद के अपेक्षा करना सिखाती है | तीसरी माँ, न सिर्फ बच्चे को उठाती है, पर उसके साथ फर्श को पीटकर उसे अपने बच्चे को गिरा देने का आरोप भी लगाती है, और यह बालक जीवन में अपनी हर गलती के लिए दूसरों को जिमेदार मनाता है.| 

जीवन के सबक संघर्ष से ही आते है , हमें अपने बच्चों  को बड़ा होने का मौका देना चाहिए | शत प्रतिशत अंको की अपेक्षा अमानवीय है | आप एक बच्चे  से गलती करने का हर मौका छीन कर उसे अनुभवों से वंचित करते हैं , क्या आपने कभी सोचा है की यह बालक जब वयस्क जीवन में कोई असफलता का सामना करेगा तो उस से कैसे उठ पायेगा| हमें समझना होगा की जीवन सदैव  सफल होने का नहीं  असफलता से उबरकर अपने ध्येय की तरफ चलते रहने का नाम है  | लौईस जौह्नन कहते हैं "मुझे अभिभावकों से मिलना इसलिए पसंद है क्योंकि उन्हें जानने के बाद बच्चों  को माफ़ करना आसान हो जाता है|

कुछ भी गलत न करने देने की इस प्रवृति ने ही "कोचिंग कल्चर " को एक व्वयसाय के रूप में विकसित किया है | आज नर्सरी में पड़ने वाला हर बच्चा  अब्दुल कलाम या सचिन तेंदुलकर बनाना चाहता है ,  इसलिए नहीं की वो उनकी उपलब्धियों से प्ररित है बल्कि इसलिये  की ऐसा  कहना उसे मैडम ने सिखाया है|  एक बुद्धिमान शिक्षक  वो है जो एक विद्यार्थी को सवालों की दहलीज तक लए। उसे तर्कसंगत तरीके से  सोचने का तरीका सिखाये ,मगर इन दिनों क्या सोचना है यह भी शिक्षक सिखाते हैं|  यह भूलकर कि शिक्षा घड़े को भरने का  नहीं,  बल्कि चिंगारी को जगाने का नाम है| 

ज्ञान के साथ सवेंदना का विकास ही संपूर्ण शिक्षा है | समस्याएँ कई है, और समाधान भी कई | जरुरत है एक पहल की,  जो बस आप कर सकते हैं अपने घर से, अपनी नयी पीड़ी को , एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने की कोशिश के साथ , अगर हम आने वाली पीड़ियों  को एक सभ्य समाज देना कहते हैं , तो शिक्षा ही हमारी एक मात्र आशा भी है और एकमात्र हथियार भी।  दुष्यंत कुमार जी की ये  पंक्तियाँ  वो सब कहती हैं , जो आखिर में कहना चाहता हूँ :

यह लड़ाई, जो कि , अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी, पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है........


Sunday, September 14, 2014

प्रतीकों की नहीं , प्रयोगों की है जरुरत


कल  हम समाचार पत्रों में  पढ़ेंगे , कि  आज हिंदी दिवस की  रस्म पर कहाँ , कितने समरोह आयोजित किये गए। किन मंत्रियों ने कहाँ दीप  जलाये और  हिंदी के   का विकास का बीज बोकर  उसे सींचने  का जिम्मा  किस तरह , अगले साल तक हमें देकर देश को अनुग्रहित  किया।विद्यालयों में निबन्ध  प्रतियोगिताएँ होगी,  जहाँ हिंदी की गरिमा पर प्रकाश डाला जायेगा।   शायद  ६७ साल बाद चारों और फैली अंग्रेजियत की आलोचना  भी हो , मगर क्या इससे  उन विधालयों  में जहाँ हिंदी बोलने पर दंड है , अगले वर्ष,  प्रवेश के लिए लगने वाली कतारों में कोई  कमी होगी ? 

भाषा,  व्यक्ति की अभिव्यक्ति का  माध्यम है जिसके तार सीधे उसकी हृदय की संवेदना से जुड़े हैं।  ऐसा क्यों है, कि  आज  अग्रेजी के शब्द का गलत उच्चारण करने  का पता चलने पर तो शर्म का अनुभव होता है, मगर हिंदी के अज्ञान को सिर्फ "व्हाटएवर " के साथ कंधे उचकाकर  झटक दिया जाता है। हिंदी  न आना  , या न जानने का स्वांग करना बहुत  से भारतीयों  के लिए गर्व का विषय रहा है।  २०० साल की गुलामी के बाद "कोलोनियलिस्म  " की   जो  काई  अंतर्मन  पर जमी है , उसे हटाने के  वैद्य कारण हमें नजर नहीं आते , अंग्रजियत हमारे लिए आज भी सम्मानीय  है।  

हिंदी विश्व में संख्या के आधार बोले जाने वाली दूसरी प्रचलित भाषा है , मगर फिर भी हिंदी साहित्य में मौलिक योगदान करने वालों का कोई नाम भी नहीं जानता , हिंदी में छपने  वाले समाचार पत्र भी अंग्रेजी में लिखे लेखों का अनुवाद कर अपना काम चला रहे हैं  अंग्रेजी में लिखा कचरा भी मूल्यवान  है और हिंदी में लिखा श्रेष्ठ आलेख भी आज  पाठक नहीं पाता।  हम पीड़ी दर पीड़ी अपनी भाषा से दूर गएँ हैं , क्या ये विडंबना  नहीं की देश की जनता ने दिनकर और प्रेमचंद के नाम तो शायद पाठ्यक्रम में पड़े हों , हम में से ९५% ने   न दुष्यंत कुमार  का नाम सुना होगा और न फणीश्वरनाथ रेणु  का  , अगर हिंदी के प्रसार में सच में किसी ने योगदान दिया है तो वह है हिंदी गीत- संगीत।  

स्वंत्रता के बाद से  जिस तरह हिंदी को कठिन बनाने की कोशिश की गयी उस से हानि अधिक हुई , आकाशवाणी पर जब तक सिर्फ शास्त्रीय  और सुगम संगीत बजता रहा तब तक उसे लोकप्रियता नहीं मिली , पंडित नरेंद्र शर्मा  ने जब सरकारी फीताशाहों को ये समझाया की जब तक आप जनता की मांग नहीं समझेंगे जनता आपसे नहीं जुड़ेगी  . कोई भी  संगीत अछूत नहीं ये समझ आने पर ही  कहीं  फ़िल्मी गीत रेडियो पर  विविध भारती से बजना शुरू हुए  , और उन गीतों ने कैसे भारत को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ा इसे किसी प्रमाण की जरुरत नहीं।   ये सोच का विषय है कि  साहित्य ऐसा क्यों नहीं कर पाया,  क्योंकि शायद ये अपने आप को व्याकरण के बंधन  से आज़ाद नहीं कर पाया।  कैसे कहा जा रहा,  इस से ज्यादा आवश्यक है की क्या कहा जा रहा है  , उसे रोचक और वृहद बनाये  जाने के प्रयोगों में कहीं कमी रही।  

अंग्रेजी में विज्ञानं और साहित्य का अपूर भंडार उपलप्ध है , अंग्रेजी ने सब से लिया है , लैटिन से,  ग्रीक से , उन्हें किसी  भी भाषा के प्रचलित  शब्द जोड़ने में कोई परहेज नहीं रहा।   उन्होंने हमसे 'कच्चा' भी लिया और 'पंडित' भी और तमिल से 'केटामरीन'  भी  , मगर हम अपनी ऊर्जा को ,  अपनी भाषा को व्यापक और  प्रचुर बनाने की जगह,  उसकी महानता  का गुणगान करने में  या अंग्रेजी का विरोध करने में ही लगाते  रहे।जरुरत है हिंदी को सिंहासन से उतारकर आम आदमी के बीच लाने की।हवाई अड्डे  को , विमान उतनपटन स्थल और ट्रेन  को लोपथगामनी कहे जाने की जिद कर, आप हिंदी भाषा का विकास नहीं,  उसे संस्कृत की तरह विलुप्त होने की राह पर ले जा रहे हैं.  भाषाएँ एक दुसरे के प्रतिद्वंद्वी बनाये जाने की जगह एक दुसरे की पूरक बने। मुद्दा तो आज मूल मौलिक  विचार का है, भाषा तो सिर्फ माध्यम है प्रकर्ति  की तरह सक्षम और फैलाव लिए  , बकौल  शायर
वो तो खुशबु  है हवाओं में बिखर जायेगा
मसला  तो फूल का है फूल किधर जायेगा   

मेरे विचार में , हिंदी दिवस जैसे प्रतीकात्मक आयोजन करने से कहीं बेहतर है अच्छे  पुस्तकालयों का निर्माण किया जाये , जहाँ  अच्छी पुस्तकें व पत्रिकाएं उपलप्ध हों। जरुरत है इंटरनेट , सोशल मीडिया, मोबाइल पर हिंदी में आसानी से टाइप करने वाले सॉफ्टवेयर को बढ़ावा देने की। जीवन में ज्यादातर चीजें अनुभव से ही सीखी जा सकती हैं और अनुभव स्वयं करने व जुड़ने से मिलता है , उसे  सुन- देख कर प्राप्त नहीं किया जा सकता। जरुरत है ऐसे सार्थक  प्रयोगों की जिस से हिंदी भाषा भारतीयों  की जिंदगी का हिस्सा बने , बिना दबाव के, बिना लालच के ,सिर्फ उसकी समृद्धता एवं सुंदरता के कारण। 

Wednesday, August 14, 2013

१५ अगस्त २०१३

गलियों के सब नाम मिटा दें  
शहरों की पहचान  मिटा दें  
सड़क, दिशा के नाम छोड़  दें 
बांटे ऐसी हर   दीवार तोड़  दें 
आओ, फिर ढूंढे  मिल कर के 
मुल्क ,शहर ,का कोना  कोना 
जहाँ भी एक स्वंतंत्र मन मिले 
जहाँ भी एक अतृप्त मन मिले 
चलने को संकल्पित तन मिले  
बस इसी पते पे मेरा  घर हो।

१५ अगस्त २०१३