Tuesday, October 13, 2009

एक कविता

नीरजजी की इस कविता ने हमेशा से मुझे बहुत प्रभावित किया है , क्योंकि यह मुझे इंटरनेट पे कहीं नहीं मिली, तो मैंने सोचा मैं ही इसे publish करुँ ताकि आप भी इन भावनाओं को महसूस कर सकें ...............

हर सुबह जगाने वाले, हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना  जग में, तो फिर मुझे नयन मत देता

जिस दरवाज़े गया ,मिले बैठे अभाव, कुछ बने भिखारी
पतझर के घर गिरवी थी ,मन जो भी मोह गई फुलावारी
कोई था बदहाल धुप में, कोई था गमगीन छावों में
महलों से कुटियों तक थी, सुख की दुःख से रिश्तेदारी
हर खेल खिलाने वाले , हर रस रचाने वाले
घुने खिलोने थे जो तेरे, गुडियों को बचपन मत देता

गीले सब रुमाल अश्रु की पनहारिन हर एक डगर थी
शबनम की बूदों तक पर निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
निरवंशी थे स्वपन दर्द से मुक्त था कोई भी आँचल
कुछ के चोट लगी थी बाहर कुछ के चोट लगी भीतर थी
बरसात बुलाने वाले बादल बरसाने वाले
आंसू इतने प्यारे थे तो मौसम को सावन मत देता

भूख़ फलती थी यूँ गलियों में , ज्यों फले यौवन कनेर का
बीच ज़िन्दगी और मौत के,फासला था बस एक मुंडेर का
मजबूरी इस कदर की बहारों में गाने वाली बुलबुल को
दो दानो के लिए करना पड़ता था कीर्तन कुलेर का
हर पलना झुलाने वाले हर पलंग बिछाने वाले
सोना इतना मुश्किल था, तो सुख के लाख सपन मत देता

यूँ चलती थी हाट कि बिकते फूल , दाम पाते थे माली
दीपों से ज्यादा अमीर थी , उंगली दीप बुझाने वाली
और यहीं तक नहीं , आड़ लेके सोने के सिहांसन की
पूनम को बदचलन बताती थी अमावस की रजनी काली
हर बाग़ लगाने वाले हर नीड़ लगाने वाले
इतना था अन्याय जो जग में तो फिर मुझे विनम्र वचन मत देता

क्या अजीब प्यास की अपनी उमर पी रहा था हर प्याला
जीने की कोशिश में मरता जाता था हर जीने वाला
कहने को सब थे सम्बन्धी , लेकिन  आंधी के थे पते
जब तक परिचित हो आपस में , मुरझा जाती थी हर माला
हर चित्र बनने वाले, हर रास रचाने वाले
झूठे थी जो तस्वीरें तो यौवन को दर्पण मत देता

हर सुबह जगाने वाले हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना जग में तो फिर मुझे नयन मत देता... 

11 comments:

  1. yes sir..this is the amazing one poem by poet Niraj ji..

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  2. Bahut Barhia...Aapka Swagat Hai... Isi Tarah Likhte Rahiye....

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  3. चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
    ---

    दोस्ती पर उठे हैं कई सवाल- क्या आप किसी के दोस्त नहीं? पधारें- (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

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  4. बहुत अच्छा लेख है। ब्लाग जगत मैं स्वागतम्।

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  5. हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं.....
    इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूं

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  6. आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर धन्यवाद

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  7. अच्छा लिखा आपने ।
    बधाई ।

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  8. namaste sir,bahut khubsurat panktiya sir.inspirational poem.....but ap jaldi jaldi publish krte to aur achha hota.but really its nice sir...........

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