Tuesday, January 20, 2015

" हिंदी में अन्य भाषाओँ के शब्दों के प्रयोग का प्रचलन हिंदी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप है " ?


भाषा, व्यक्ति की अभिव्यक्ति का माध्यम है, जिसके तार, सीधे उसकी हृदय की संवेदना से जुड़े हैं। इस से पहले कि हम मूल प्रश्न  का उत्तर निर्धारित करने की चेष्टा करें , हमें इस से जुड़े कुछ आधारभूत पक्षों  की विवेचना कर लेनी चाहिए । 
भाषा क्या है ? भाषा की आवश्यकता क्यों है ? बोलियों से विभाषा और विभाषाओं से भाषाएँ किस तरह विकसित होती हैं ? क्यों कुछ भाषाएँ समय के साथ प्रचलित रहती हैं और क्यों कुछ अप्रासंगिक और विलुप्त होकर सिर्फ ऐतिहासिक महत्त्व की रह जाती हैं ? 
भाषा वह साधन है जिसके द्वारा किसी समूह या क्षेत्र के लोग अपने मन की बात तथा विचार व्यक्त करते है और इसके लिये वे न सिर्फ नाद ध्वनियों का बल्कि ऐच्छिक संकेतो का भी उपयोग करते है, जिनका किसी विशेष अर्थ से मौलिक अथवा दार्शनिक सम्बन्ध आवश्यक नहीं होता । भाषा सिर्फ ध्वनि प्रकृति न रखकर भाव प्रकर्ति  भी रखती है जो शब्द निर्माण और व्याकरण में मुखरित होती है। भाषा कोई ईश्वरीय देन नहीं बल्कि इसे मनुष्य ने  अपनी बुद्धि से, अभिव्यक्ति के सुगम तरीके के लिए विकसित किया है जो मनुष्य की प्रगर्ति  में सहायक रही है। हमारी हिंदी , भाषाविज्ञान की द्रष्टि  से भाषाओं के आर्य वर्ग की उपशाखा भारत-ईरानी समूह से है ,जो मूलतः  संस्कृत की वंशजा मानी गयी है और मध्यकालीन आर्यभाषाओं के अलावा द्रविड़, तुर्की, फारसी, अरबी, पुर्तगाली, तथा अंग्रेज़ी भाषाओं के वैविध्य से समृद्ध और व्यापक हुई है। 
मूल विषय पर आयें  , तो हम  खुद को दो पारस्परिक विरोधी विचारधाराओं के वर्गों के बीच खड़ा नज़र पाते हैं। पहला वर्ग वो, जिसे अग्रेजी या फ्रेंच शब्द के  गलत उच्चारण करने का पता चलने पर तो शर्म का अनुभव होता है, मगर हिंदी के अज्ञान को वह सिर्फ "व्हाटएवर " के साथ कंधे उचकाकर झटक देता है।  गोया , सदियों की गुलामी के बाद "कोलोनियलिस्म " की जो काई अंतर्मन पर जमी है , उसे हटाने के कोई  वैध्य कारण उन्हें नजर नहीं आते। दूसरा वर्ग वो है जो मौलिकता  बनाये रखने के नाम पर हवाई अड्डे को , विमान उत्तनपटन स्थल और ट्रेन को लौहपथगामिनी  कहे जाने की जिद में है। विडम्बना ये भी है कि जो लोग आज हिंदी की शुद्धता बनाये रखने की गुहार लगाते हैं , उनमे से ही कई अपने बच्चों को ऐसे  विद्यालयों  में प्रवेश दिलवाने के लिए लगी कतारों में नज़र आते हैं , जहाँ हिंदी बोलने पर ही  दंड है । 
जिस समाज में हम रहते हैं उसकी भाषा का असर ,साहित्य पर ,फिल्मों पर ,गीत संगीत पर आना स्वाभाविक है क्योंकि रचनाकार भी उसी समाज का हिस्सा है जिसे वो सम्बोन्धित करना चाहता है ।  दूसरी भाषा से प्रचलित शब्द जो वैसे भी हमारी आम ज़िन्दगी में जगह बना चुके हैं व  जिनसे व्याकरण , कर्ता ,  कारक और क्रिया  का क्रम  प्रभावित न होता हो, जोड़ने में हर्ज़ क्या है ? मेरे विचार में, अगर हिंदी के प्रसार में सच में किसी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है तो वह है हिंदी गीत- संगीत। गौर कीजिए  , आकाशवाणी पर जब तक सिर्फ शास्त्रीय और सुगम संगीत बजता रहा तब तक उसे लोकप्रियता नहीं मिली। पंडित नरेंद्र शर्मा ने जब सरकारी फीताशाहों को ये समझाया  की कोई भी संगीत अछूत नहीं और  जनता से जुड़ने के लिए उसकी मांग समझना जरुरी है।  तब कहीं  फ़िल्मी गीत रेडियो पर विविध भारती से बजना शुरू हुए , और उन गीतों ने कैसे भारत को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ा इस तथ्य को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं। ये सोच का विषय है कि साहित्य ऐसा क्यों नहीं कर पाया, क्योंकि शायद ये अपने आप को भाषाई  जंजीरों की लम्बाई से आगे नहीं बढ़ा पाया। कैसे कहा जा रहा है , इस से ज्यादा आवश्यक है जानना  कि जो कहा  जा रहा है क्या वो रोचक और उपयोगी   है ? क्या कोई , उसे सुन और समझ भी रहा है  या स्थिति बस खुद दिल से दिल की  बात कहकर,  रोने जैसी है ? 
कुछ जोड़ने से कुछ घटता नहीं , आज अंग्रेजी में विज्ञानं और साहित्य का अपूर भंडार उपलब्ध  है , अंग्रेजी ने सब से लिया है- लैटिन से, ग्रीक से , उन्हें किसी भी भाषा के प्रचलित शब्द जोड़ने में कोई परहेज नहीं रहा। उन्होंने हमसे 'कच्चा' भी लिया और 'पंडित' भी और तमिल से 'केटामरीन' भी। अगर हम अपनी ऊर्जा को , अपनी भाषा को व्यापक और प्रचुर बनाने की जगह, सिर्फ उसकी महानता का गुणगान करने में और उसे व्यहारिकता के धूप  के बिना बस संस्कारों के पानी से सींचेंगे तो मेरा मानना है की हम हिंदी को  विकास-पथ पर  नहीं अपितु  संस्कृत की तरह विलुप्त होने की राह पर ले जा रहे हैं। 
जीवन का पर्याय गति है और यह श्लोक "जीवने केवलं परिवर्तनमेव स्थिरमस्ति" जो जीवन व उस से जुडी गतिशीलता का घोतक  है ,  हमें समझाता है कि केवल परिवतर्न ही चिर स्थायी है । संसार की सभी बातों की भाँति भाषा  भी  मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से ,खड़ी  बोली और फिर आज की मिर्श्रित भाषा  तक बदलती रही है ।  मेरा मानना है की मुद्दा आज भाषा का नहीं , मूल मौलिक विचार का है, भाषा तो सिर्फ माध्यम है, प्रकर्ति की तरह सक्षम और फैलाव लिए , बकौल शायरा परवीन शाकिर 
वो तो खुश्बू  है हवाओं में बिखर जायेगा
मसला तो फूल का है, फूल किधर जायेगा
मेरे विचार में , जरुरत है हिंदी को सिंहासन से उतारकर आम आदमी के बीच लाने की। अंततः कोई बुराई नहीं उन शब्दों को  जोड़ने में जो व्यवहारिकता  में हमारे जीवन से वैसे भी हमसे जुड़ चुके हैं।  अगर हमें सचमुच हमारी भाषा को समृद्ध बनाने की मुहिम शुरू करनी है तो यह इसमें मौलिक सृजन  को बढ़ावा देकर , पुस्तकालयों  में उच्च कोटि का हिंदी साहित्य लाकर ,हिंदी में लिखने के सॉफ्टवेयर को प्रचलित कर के किया जाना होगा। साहित्यकार थॉमस मान  कहते हैं  "हर शब्द, चाहे वो कितने भी विरोध में  क्यों न कहा गया हो, जोड़ता है , ये तो ख़ामोशी है, जो दूरियां बढ़ाती है। हमें हमारी इस सुन्दर भाषा की उच्छल तरंगो  को समाज के समुद्र में फैलने देना होगा , इसे अपने ही शब्दों के किनारों में बांधने  की कोशिश ही एक अभिशाप होगी।

Friday, November 14, 2014

धूसर चेहरे और व्यवस्थाओं के मैले दर्पण

किसी भी व्यक्ति या विचारधारा के प्रति पूर्ण समर्पण, स्वतंत्र सोच पर दीमक का कार्य करता है। इन संकुचित पैमानों से नापकर न तो सत्य की खोज की जा सकती है और न ही पूर्वाग्रहों से ग्रसित बुद्धि से कोई मौलिक सृजन संभव है। असहिष्णुता , तर्कविहीन बहसों और अंधी आस्था का जो मौहाल आज चारों तरफ फैला है, उसे देखकर दुष्यंत की ये पंक्तियाँ बार बार याद आती हैं।
पाबंद हो रही है रवायत* से रौशनी
चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब
रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं
अंधों को रोशनी का गुमाँ और भी ख़राब
* परम्परा ,रिवाज़

जरा सोचिये , अगर किसी महान जनतंत्र के प्रधानमंत्री को जनता से अपने घर, गली- मोहल्ले और शहर को स्वच्छ रखने का आव्हान करना पड़े , तो ये उस देश के महान देशवासिओं के लिए गर्व का विषय होना चाहिए या शर्म का? यक़ीनन , इसका जवाब खोजने  के लिए एक रॉकेट विज्ञानी सी बुद्धि होना आवश्यक नहीं।

अब तक , घर में सफाई करते वक़्त पंखा बंद रखने की हिदायत दी जाती थी जिससे कचरा न उड़े , मगर इन दिंनो सफाई का स्वांग रचते कुछ महान नेता कैमरा चालू करने की मांग करते हैं ,गोया , उनकी नीयत की तरह गर्द चाहे साफ न हो , सफाई होने की खबर दूर तक उड़े। ऐसे विदूषकों को उनके राजनैतिक दल के प्रमुख कैसे झेलते होंगे और ऐसे रीड़ -विहीन ,तर्क विहीन, दोयम दर्ज़े के बहुरुपियों को हम कैसे हमारा प्रतिनिधि चुन लेते हैं, ये एक शोध और सोच का विषय हो सकता है।

हम ऐसे क्यों है ? जानने की चेष्टा न कर मान लेने तत्परता हमारी फितरत क्यों है ? आदर्शवादी सिद्धातों के देवदार वृक्ष बनने की जगह , हम व्यहारिकता की लचीली बेलें बनना कैसे गवारा कर लेते हैं ? मंच से संवाद की जगह नेपथ्य से जुगाड़ हमारी प्राथमिकता क्यों है ? हम राष्ट्र वाद को कभी हिंदुत्व तो कभी इस्लाम से कैसे जोड़ लेते हैं? मुद्दों से ज्यादा हमारी रूचि व्यक्तियों में क्यों रहती है ? एक जनतत्र में हम किसी पार्टी की सोच या विचारधारा की जगह उसके एक नेता को सर्वोपरि कैसे मान लेते हैं ? अपनी मेहनत से नव निर्माण की नीव रखने की जगह हमें किसी जादुई शक्ति का इंतज़ार क्यों है ? 

शायद इन सब सवालों के जवाब हमारी परवरिश , शिक्षा और अवधारणों से जुड़े हैं। बचपन में विधालय की प्रार्थना  से शुरू करें तो वो सिखाती है " शरण में आये हैं हम तुम्हारी , दया करो हे दयालु भगवन" , घरों में बचपन से दादी नानी को कहते सुना होगा ,सब अच्छा- बुरा बस उसके हाथ में है, हम तो बस कठपुतलियां है , जिनकी डोर पकडे वह हमें नचा रहा है। हम इसी सोच के साथ बड़े होते की हम अज्ञानी मूर्ख हैं और कोई सर्वज्ञानी जादुई परमेश्वर ही हमारा पालन हारा है, जिसकी दया अनुकम्पा से ही हमारा गुज़र है। हमारे परिवेश में ईश्वर की परिकल्पना किसी शक्ति पुंज सी नहीं बल्कि किसी अभिमानी शासक या किसी मोहल्ले के दादा जैसी है , जो उसके एजेंट नुमा स्वघोषित पैगम्बरों की बात न मानने पर हमें देख लेगा। 

हमारी प्रार्थनाएं  तक चापलूसी से भरी हैं , किसी ईश्वरीय शक्ति से कर्म करते रहने के हौसले की मांग करने की जगह यहाँ भी हम किसी घमंडी राजा को चापलूसी  के द्वारा खुश करने की चेष्टा  में नजर आते हैं।  एहसासे - कमतरी के ये बीज जो बालक के अवचेतन की कच्ची जमीं पर बोये जाते हैं, आगे चल पलायन वाद के पौधे में बदलते है ,जिनकी शाखों पर बेईमानी, रिश्वतखोरी के बेरंग फूल खिलते हैं और जिनकी छिछली छाया में भाई भतीजावाद पनपता है। 

मेरे विचार में प्रार्थना , एकाग्रता के साथ अपनी वैचारिक शक्ति को केंद्रित करने का जरिया है , किसी आलोकिक शक्ति से चापलूसी कर,  कोई सिफारिशी अर्ज़ी लिखवा लेने का जुगाड़ नहीं. किसी भी तरह की सफलता के लिए अथक श्रम आवश्यक है।   एक छोटा सा किस्सा है। एक बार दो बहनों को दुसरे नगर जाना था मगर उन्हें घर से निकलने में देर हो गयी। छोटी ने कहा " दीदी , अब कोई संभावना नहीं, मंदिर में रुक कर प्रार्थना  करते हैं कि , आज गाड़ी लेट हो जाये। दूसरी ने कहा " तेज़ी से दौड़ कर स्टेशन पहुचने की कोशिश करते हैं और दौड़ते हुए प्रार्थना  भी करते हैं के आज गाड़ी लेट हो" .  कर्म के बिना कुछ सकारात्मक  संभव ही  नहीं , इसी संदर्भ में निदा फ़ाज़ली की खूबसूरत पंक्तियाँ है। 
कोशिश भी कर, उम्मीद भी रख, रास्ता भी चुन
फिर उसके बाद , थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर.
विडंबना है कि , कर्म की तपिश से कुंदन बनने की चेष्टा छोड़ हमने लोहा बने रह किसी पारस का इंतज़ार किया है।  बड़ी चतुराई और धूर्तता से मानवों का अवतारीकरण किया है पर  मनुष्य को पत्थर से अधिक कुछ नहीं समझा। 

क्या नीतियों में एक बड़े आधारभूत परिवर्त्तन के बिना कोई बड़ा सामाजिक बदलाव मुमकिन है ? आर्थिक और सामाजिक समानता असंभव लक्ष्य है मगर ऐसा तंत्र तो यक़ीनन संभव है जो सभी को समान  अवसर प्रदान करे। सोचना होगा हम सबको ,  क्या इसी स्वराज के लिए, जो एक प्रकार की तानाशाही से अधिक कुछ नहीं, हमारे शहीदों ने अपने प्राण दिए थे ? विडम्बना यह है की यह तानाशाही भी सर्वसुविधा-संपन्न वर्ग के द्वारा प्रायोजित है , जिसकी सेवा में हर सरकार व व्यवस्था हमेशा तत्पर रहती हैं। अधिकांश जनता नें अपनी आस्था आज एक चमत्कारी खूँटी पर टांगी है और माहौले - अकीदत में पीछे की दीवार की मजबूती की हकीकत का जायजा लेने को कोई तैयार नहीं।   

दरअसल, जब व्वयस्था के आइनों पे मैल जमी हो तो आम नागरिक को  अपनी धूसरित  छवि  के लिए  सिस्टम को दोष देने के जायज बहाने मिल जाते हैं, इसलिए चेहरों की धूल हटाने के साथ दर्पणों की सफाई भी जरुरी है। देश की कालीन से भ्रष्टाचार की गर्द आमूल झाड़ देने का दावा करने वालों को पहले अपने कीचड़ सने पाँव धोने होगें। जादुई छड़ी लिए कोई अवतार हमें किसी गन्दगी से निजात दिलाकर स्वछ नहीं बना सकता , सही मायनो में सफाई के लिए  शुद्ध आचरण से हमें ही  अपने चरित्र  बुहारने होंगे।  इस तंत्र को जंग  हमारी चुप्पी ने लगाया है और हमारी आवाज़ और संघर्ष ही इस से मुक्ति का साधन हैं , दुष्यंत के शब्दों से प्रेरणा लेकर बस यही आवाहन  किया जा सकता है।  
पुराने पड़ गये इन डरों को , फेंक दो तुम भी ,
ये कचरा आज मन से बाहर, फेंक दो तुम भी
ये मूरत बोल सकती है , तुम अगर चाहो
कुछ बोल, कुछ स्वर, इन में फेंक दो तुम भी
किसी संवेदना के काम आएँगे
यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी ..... 

Monday, October 13, 2014

बातें 'सत्यकाम' की


कुछ कहानियाँ , कुछ कविताएँ , कुछ गीत , हमारे भीतर कभी ख़त्म नहीं होते। वो जैसे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं , कभी प्रेरणा बन कर , कभी कोई याद बन कर , और , कभी चाह कर भी,  कुछ न कर पाने की व्यथा से जनित पीड़ा बन कर।

1969 में ऋषिकेश मुख़र्जी ने नैतिकता , ईमानदारी और सच्चाई को आधार बनाकर इस ख़ूबसूरत फ़िल्म सत्यकाम की रचना की थी। फिल्म में आदर्शवाद के दुर्गम राहों की तकलीफो का जिक्र भी था और व्यहारिकता की पतली गलियों की फिसलती  ढलानों पर एक तंज़ भी। ये कृति एक सवेंदनशील हृदय के लिए गहन सोच का सामान थी। आश्चर्य की बात नहीं कि  नैतिकता और सच्चाई  का ढोल पीटने वाले हमारे समाज ने इस फ़िल्म को ठीक से देखने की कोशिश तक नहीं की , नतीज़न  फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही।

संजीव कुमार यानी नरेन सूत्राधार हैं  पूरी कहानी के , जो केंद्रित है उनके मित्र सत्यप्रिय आचार्य यानी धर्मेन्द्र पर, जिसका सत्य के प्रति समर्पण और आचरण की शुद्धता दीवानगी की हद तक है। यह एक ऐसे इंजीनियर की कहानी है जो भ्रष्ट सिस्टम को दोष देकर अपनी जिमेदारी से मुक्त नहीं होना चाहता . यह दास्ताँ एक ऐसे अधिकारी की, जो नौकरी से इस अहसास से त्यागपत्र दे देता है कि जब वो अपने मातहतों को न्याय नहीं दिला सकता, तो उन्हें सजा देने का भी उसे कोई हक़ नहीं।

व्यहारिकता के नाम पर भ्रष्टाचार की जड़ें सींचने वाले इस समाज में जिस तरह आज भी एक ईमानदार आदमी को मूर्ख और अड़ियल घोषित कर , तबादलों की यातना देकर या फिर अंत में गोलियों की बौछार से शांत किया जाता है, वही हश्र इस सत्यप्रिय आचार्य का भी फ़िल्म में होता है। वह सच्चाई के लिए लड़ते-भिड़ते आख़िर कैंसर का शिकार हो जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शायद कथा लेखक कहना चाहते थे कि भ्रष्टाचार बहुत बड़ा कैंसर है जो इंसानी ईमान को या फिर इंसान को ही खा जाता है। फिल्म के प्रदर्शन  के बाद जब एक पत्रकार ने ऋषिदा से पुछा की उन्होंने आखिर में सत्यप्रिय को मार क्यों दिया ? उनका जवाब था " क्या आपको लगता है आज के समाज में सत्यप्रिय जैसे लोग जीवित रह सकते हैं ? इस उत्तर से उठे सवाल का जवाब तो आज ४४ साल बाद भी हम नहीं ढूंढ पाएं है.

फ़िल्म का प्रारम्भ और और अंत सत्य की गूढ़ परिभाषा से ही होता है , फिल्म की शुरुआत इस पौराणिक कहानी से होती है।
"सत्यकाम ने गुरु गौतम के पास जाकर कहा : भगवन मुझे अपना शिष्य बनाइए।
गुरु गौतम ने पूछा : तुम्हारा गोत्र क्या है ?
सत्यकाम ने कहा : मां से मैंने पूछा था। मां ने कहा बहुतों की सेवा करके तुम्हें पाया। इसलिए तुम्हारे पिता का नाम मैं नहीं जानती। लेकिन मेरा नाम जबाला है इसलिए तुम्हारा नाम जबाल सत्यकाम है। यही कह।
ऋषि गौतम ने सत्यकाम का सिर चूमकर कहा : तुम्ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हो। क्योंकि तुममें सत्य बोलने का साहस है।"

फ़िल्म के अंत में सत्यप्रिय की मृत्यु के बाद दादा (अशोक कुमार) जिसने सत्यप्रिय के विवाह और उसकी पत्नी रंजना के बच्चे को कभी स्वीकार नहीं किया, वह आख़िर में सच की शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाते है। क्योंकि वह बच्चा सार्वजनिक रूप से सामने आकर उनसे कहता है कि वे उसे पिता के संस्कार कर्म से इसलिए दूर रखना चाहते हैं क्योंकि वह उनके पोते का बेटा नहीं है। हैरतज़दा दादाजी अपने भगवा वस्त्रों और लहराती सफ़ेद दाढ़ी में बेचैन होते हुए पूछते हैं कि आख़िर इतने छोटे-से बच्चे को इतना कड़वा सच किसने बताया। बालक कहता है "माँ ने ". सच है , हर युग में मां जबाला और सत्यकाम तो होते ही रहेंगे फिर चाहे दुनिया भले ही उनको उनके सत्य रूप में पहचान पाए कि न पहचान पाए।

पटकथा के साथ इस फिल्म का एक और मजबूत पहलू है, श्री राजेंद्र सिंह बेदी के संजीदा संवाद। ऐसा लगता है, मानो किसी ने हमारे समाज को बेबाकी से सरे बाजार ला दिया है, हिसाब मांगने के लिए । गौर करिये मंत्री के लिखित शिकायत देने की हिदायत पर सत्यप्रिय कहते है "सर , वो लोग क्या लिखकर रिश्वत लेते हैं जो मैं आपको उनके नाम लिखकर दूँ ? कुछ संवाद आपको विश्वास भी दिलाते है कि इंसान अभी भी भरोसे के क़ाबिल हो सकता है जब मत्रीजी घर आ कर कहते है " बेटा , तुम ज़िन्दगी में बहुत दुःख देखोगे , बहुत कुछ सहना पड़ेगा मगर तुम्हारा ये दुःख और दर्द ही हमारी उम्मीद है , जिस पर आने वाली पीड़ी की नीवं रखी जाएगी।  कुछ पैगाम भी दिया है हम सब के लिए बेदीजी  ने ऐसे संवादों में  "मैं इंसान हूं। भगवान की सबसे बड़ी सृष्टि। मैं उसका प्रतिनिधि हूं। किसी अन्याय के साथ कभी सुलह नहीं करूंगा। कभी नहीं करूंगा’।

इस फिल्म को देखकर व्यथित हो जाता हूं, मगर फिर भी इसके अंशों को बार बार देखा है।  इस उम्मीद में कि  जितना कुछ अंदर बच पाया है, कम से कम वही बचा रह जाए। परदे पर ही सही, ऐसे चरित्रों  को देख कर सम्बल और विश्वास  मिलता है कि , इंसान का जीवन यक़ीनन उस बेहूदगी, उस बेचारगी , को पार करने में है, जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है । जो जैसा है, जहां है,  को स्वीकार करने वालों के बहुमत वाली, व्यहारिकता के नश्तरों से  सच का अपनी सुविधा से कांट छांट  करने वाली इस स्याह  दुनिया में उन्हीं लोगों की मौजूदगी से उजाला है  जिनके लिए जीवन अपने आदर्शो को जीवित रखने का संघर्ष है। जो लोग  न्याय और अन्याय को बारीकी से पहचानते हैं और न्याय के पक्ष में निर्भीक होकर सच बोल सकते हैं। फिल्म में , सत्यप्रिय के बारे में एक जगह नरेन् का कथन है ‘ऐसा लगता था मानो उसका झगड़ा दुनिया से ही नहीं, ख़ुद से भी है।’ सच है,  और ये भी सच है कि यह सच, सच  की संवेदना और मायने  समझने वाले इंसानो, को ही समझ में आ सकता  है।
महान साहित्यकार गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ का कथन है  " मनुष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही बार उस रोज़ जन्म नहीं लेते जब उनकी माताएं उन्हें पैदा करती हैं,जीवन बार बार उन पर अहसान करता है, कि वे स्वयं को जन्म दें "।हम में से गिने चुने ही  इन अवसरों का उपयोग कर पाते  हैं , और , वो हमेशा जीवित रहते हैं , दूसरों के ख़्वाबों और जज्बों में अपने जीवन से ये पैग़ाम देते हुए
माना की इस चमन को न गुलज़ार कर सके
कुछ खार तो कम कर गए गुज़रे जिधर से हम।  

पूरी फिल्म देखने के लिए यहाँ क्लिक करें सत्यकाम you tube पर ....
अगर समय न हो तो मेरे द्वारा upload किये गए दो अंश देख सकते हैं, यहाँ क्लिक कर के .......

Saturday, September 27, 2014

क्या हो शिक्षा का उधेश्य ?


गूगल व हिंदुस्तान , ने वेब पर हिंदी को बढावा देने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया था | इस प्रतियोगिता के लिए मैंने "शिक्षा : जीवनशैली या व्ययसाय ?" विषय पर यह लेख लिखा था |सौभाग्य से इसे पुरस्कृत  भी किया गया . अब क्योंकि KNOL गूगल द्वारा बंद किया जा रहा है इसे यहाँ पोस्ट कर दिया है |

सवाल से शुरू कर रहा हूँ, क्योंकि, इन सवालों में ही कहीं मेरी अज्ञानता छुपी है, और मेरी अज्ञानता का ज्ञान, मेरी प्रेरणा भी है व मेरे लिए शिक्षा का मूल मंत्र भी | शिक्षा कई रहस्यों से पर्दा हटाती है और इस प्रक्रिया में कई नए प्रश्नों को जन्म भी देती है | किसी भी तरह कि शिक्षा का आधारभूत ध्येय होना चाहिए, व्यक्ति का बौद्धिक विकास, जो एक मानव को प्रश्नों पर सोचने को बाधित करे, जो एक इंसान को तर्क व विचार से निर्णय लेना सिखाये. क्योंकि यह सिर्फ सोच है, जो एक मनुष्य को,एक प्रशिक्षित पशु से अलग करती है| एक शिक्षा पद्धिति  का मूल उधेश्य होना चाहिए,श्रेष्ठ नागरिक और अच्छे इंसान बनाना मगर दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा पद्धिति  केंद्रित है सफल आदमी बनाने में , और बकौल ग़ालिब "आसान नहीं आदमी को भी इंसान होना"|

दृष्टि  घुमाकर देखिये , आपके चारों और आपको अशिक्षित डिग्रीधारी मिल जायेंगे | आज के युवक के वाहन चलाने के तरीके में , उसकी अभिव्यक्ति  ,विचारों और जीवन मूल्यों में आप हमारी शिक्षा पद्दति कि असफलता की  दुर्गन्ध को महसूस कर सकते हैं| जो शिक्षा,  जीवन का पर्याय  सफल होना और सफलता के मायने बस अमीर होना सिखाती हो, वो  हमें मशीनों को चलाने और बेचने वाले हाथ तो दे सकती है मगर उन मशीनों को बनाने वाला दिमाग नहीं दे सकती | हर मनुष्य जन्म से जिज्ञासु  होता है , मगर समय के साथ जिज्ञासा कि इतिश्री होती है, सब कुछ मान लेने के दुर्भाग्य में, या सब कुछ जान लेने के भ्रम में | यहाँ , मस्तिक्ष   की अँधेरी कन्दाओं में उलझे, विचारों के उलटे चमगादड शब्दों के जाल में आंदोलित तो होते हैं मगर उड़ नहीं पाते , और मानव , प्रकर्ति  की सबसे श्रेष्ठ कृति , इन परिस्थितयों के लिए, एक रोबोट कि तरह गलत प्रोग्रामिंग को जिमेदार बनाकर अपने हर कर्त्तव्य से विमुख हो जाता है |

समस्याओं से परे हट समाधान कि तरफ आना चाहूँगा, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट में स्नाकोतर उपाधियाँ लेने के बाद मैं एक शिक्षक हूँ,किसी बाध्यता के कारण नहीं , अपनी मर्जी से,अपनी ख़ुशी से, क्योंकि विद्यार्थियों के बीच बिताये गए घंटे मेरे जीवन को मायने देते हैं | मेरे अवलोकनों , प्रेक्षणों ,प्रयोगों ने जो अनुभव मुझे दिया है उसका निचोड़ ये है कि विषयों को शब्दों के लिए नहीं उनके आशय और अर्थ के लिए पढ़ाने  से लाभ होता है | विज्ञान सुन्दर है क्योंकि यह आपको एक इन्द्रधनुष या एक फूल कि ख़ूबसूरती का कारण समझाता है ,परिभाषाओं के दायरे से बाहर , और अंको और चिन्हों के परिचालन से ऊपर है वो ज्ञान जो किसी, क्यों ? क्या ? और कैसे ? को जन्म देता है | क्षेत्र कला का हो,वाणिज्य या विज्ञान का,  जरूरत है इस जिज्ञासा को जीवित रखने की, जररूत है हर मनुष्य को जीवन भर विद्यार्थी बनाये रखने की , और जरूरत हैं ज्ञान के साथ सवेंदेना को समन्वित करने की| गांधीजी ने भी "मानवता विहीन विज्ञान , अंतरात्मा विहीन आनन्द और चरित्र बिना ज्ञान" को समाज मूल बुराईयो में से बताया था | हमारी जरुरत है उष्मा गतिकी के नियमो के साथ ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को समझने की,व्रतीय गति के नियमों  के साथ अगर एक विद्यार्थी को शिक्षक , तेज़ी से मोड़ मुड़ने पर होने वाले खतरों को नहीं समझा पाए तो शिक्षक इसे अपनी असफलता ही माने | 

शिक्षा एक साझा प्रयास है, जिसे हम विद्यालयों के जिम्मे छोड़ कर मुक्ति नहीं पा सकते | किसी भी शिशु का पहला स्कूल है उसका घर और पहले शिक्षक उसके अभिभावक | एक बालक के अवचेतन मन पर अभिभावकों द्वारा दी गयी सलाह और उससे जनित प्रतिक्रिया उसके स्मृति पटल पर अंकित होती रहती है | एक व्यसक होने पर वो जीवन को अपने अनुभवों के आधार पर देखता है | हर बच्चा अपना जीवन अपने अभिभावकों के प्रति प्रेम से शुरू करता है, बड़ा होने पर वो उन्हें परखता है और कभी-कभी उन्हें क्षमा भी कर पाता है | आपकी प्रतिक्रियाएं , आपका पोषण एक बच्चे  के चरित्र के  निर्माण का खाका खींचते हैं | अपने शिशु  के पहले कदम किसी भी माता के लिए अविस्मर्णीय पल होते हैं।  लेकिन,  जब बालक चलाना सीखते समय गिरता है,  तो सब माताओं की प्रतिक्रिया एक सी नहीं होती | एक माता अपनी जगह खड़े रहकर अपने बालक को खुद तक आने को प्रेरित करती है जब वो बालक अपनी माँ तक पहुँचता है तब ही उसे दुलार मिलता है ऐसा करके उस अबोध के व्यकित्व में माँ एक बीज बोती है,कि किसी भी कार्य को समाप्त करने पर ही पुरुस्कार मिलता है | दूसरी माँ दौड़कर अपने बचे को गोद में उठाती है और जीवन में हमेशा दूसरों से मदद के अपेक्षा करना सिखाती है | तीसरी माँ, न सिर्फ बच्चे को उठाती है, पर उसके साथ फर्श को पीटकर उसे अपने बच्चे को गिरा देने का आरोप भी लगाती है, और यह बालक जीवन में अपनी हर गलती के लिए दूसरों को जिमेदार मनाता है.| 

जीवन के सबक संघर्ष से ही आते है , हमें अपने बच्चों  को बड़ा होने का मौका देना चाहिए | शत प्रतिशत अंको की अपेक्षा अमानवीय है | आप एक बच्चे  से गलती करने का हर मौका छीन कर उसे अनुभवों से वंचित करते हैं , क्या आपने कभी सोचा है की यह बालक जब वयस्क जीवन में कोई असफलता का सामना करेगा तो उस से कैसे उठ पायेगा| हमें समझना होगा की जीवन सदैव  सफल होने का नहीं  असफलता से उबरकर अपने ध्येय की तरफ चलते रहने का नाम है  | लौईस जौह्नन कहते हैं "मुझे अभिभावकों से मिलना इसलिए पसंद है क्योंकि उन्हें जानने के बाद बच्चों  को माफ़ करना आसान हो जाता है|

कुछ भी गलत न करने देने की इस प्रवृति ने ही "कोचिंग कल्चर " को एक व्वयसाय के रूप में विकसित किया है | आज नर्सरी में पड़ने वाला हर बच्चा  अब्दुल कलाम या सचिन तेंदुलकर बनाना चाहता है ,  इसलिए नहीं की वो उनकी उपलब्धियों से प्ररित है बल्कि इसलिये  की ऐसा  कहना उसे मैडम ने सिखाया है|  एक बुद्धिमान शिक्षक  वो है जो एक विद्यार्थी को सवालों की दहलीज तक लए। उसे तर्कसंगत तरीके से  सोचने का तरीका सिखाये ,मगर इन दिनों क्या सोचना है यह भी शिक्षक सिखाते हैं|  यह भूलकर कि शिक्षा घड़े को भरने का  नहीं,  बल्कि चिंगारी को जगाने का नाम है| 

ज्ञान के साथ सवेंदना का विकास ही संपूर्ण शिक्षा है | समस्याएँ कई है, और समाधान भी कई | जरुरत है एक पहल की,  जो बस आप कर सकते हैं अपने घर से, अपनी नयी पीड़ी को , एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने की कोशिश के साथ , अगर हम आने वाली पीड़ियों  को एक सभ्य समाज देना कहते हैं , तो शिक्षा ही हमारी एक मात्र आशा भी है और एकमात्र हथियार भी।  दुष्यंत कुमार जी की ये  पंक्तियाँ  वो सब कहती हैं , जो आखिर में कहना चाहता हूँ :

यह लड़ाई, जो कि , अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी, पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है........