गूगल व हिंदुस्तान , ने वेब पर हिंदी को बढावा देने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया था | इस प्रतियोगिता के लिए मैंने "शिक्षा : जीवनशैली या व्ययसाय ?" विषय पर यह लेख लिखा था |सौभाग्य से इसे पुरुस्कृत किया गया . अब क्योंकि KNOL गूगल द्वारा बंद किया जा रहा है इसे यहाँ पोस्ट कर दिया है |
सवाल से शुरू कर रहा हूँ, क्योंकि, इन सवालों में ही कहीं मेरी अज्ञानता छुपी है,और मेरी अज्ञानता का ज्ञान,मेरी प्रेरणा भी है व मेरे लिए शिक्षा का मूल मंत्र भी |
शिक्षा कई रहस्यों से पर्दा हटाती है और इस प्रक्रिया में कई नए प्रश्नों को जन्म भी देती है | किसी भी तरह कि शिक्षा का आधारभूत ध्येय होना चाहिए, व्यक्ति का बौद्धिक विकास, जो एक मानव को प्रश्नों पर सोचने को बाधित करे, जो एक इंसान को तर्क व विचार से निर्णय लेना सिखाये. क्योंकि यह सिर्फ सोच है, जो एक मनुष्य को,एक प्रशिक्षित पशु से अलग करती है| एक शिक्षा पद्दति का मूल उधेश्य होना चाहिए,श्रेष्ठ नागरिक और अच्छे इंसान बनाना मगर दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा पद्दति केंद्रित है सफल आदमी बनाने में और बकौल ग़ालिब "आसान नहीं आदमी को भी इंसान होना"|
द्रष्टि घुमाकर देखिये , आपके चारों और आपको अशिक्षित डिग्रीधारी मिल जायेंगे | आज के युवक के वाहन चलाने के तरीके में , उसकी अभिवयक्ति ,विचारों और जीवन मूल्यों में आप हमारी शिक्षा पद्दति कि असफलता कि दुर्गन्ध को महसूस कर सकते हैं|.जो शिक्षा जीवन का पर्याय सफल होना और सफलता का मायने अमीर होना सिखाती हो, वह हमें मशीनों को चलाने और बेचने वाले हाथ तो दे सकती है मगर उन मशीनों को बनाने वाला दिमाग नहीं दे सकती | हर मनुष्य जन्म से जिज्ञासु होता है ,मगर समय के साथ जिज्ञासा कि इतिश्री होती है, सब कुछ मान लेने के दुर्भाग्य में, या सब कुछ जान लेने के भ्रम में | मस्तिक्ष कि अँधेरी कन्दाओं में उलझे, विचारों के उलटे चमगादड शब्दों के जाल में आंदोलित तो होते हैं मगर उड़ नहीं पाते , और मानव ,ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ कृति ,एक रोबोट कि तरह परिस्थितयों के लिए गलत प्रोग्रामिंग को जिमेदार बनाकर अपने हर कर्त्तव्य से विमुख हो जाता है |
समयस्याओं से परे हट समाधान कि तरफ आना चाहूँगा,इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट में स्नाकोतर उपाधियाँ लेने के बाद मैं एक शिक्षक हूँ,किसी बाध्यता के कारण नहीं , अपनी मर्जी से,अपनी ख़ुशी से,क्योंकि विद्यार्थियों के बीच बिताये गए घंटे मेरे जीवन को मायने देते हैं | मेरे अवलोकनों , प्रेक्षणों ,प्रयोगों ने जो अनुभव मुझे दिया है उसका निचोड़ ये है कि विषयों को शब्दों के लिए नहीं उनके आशय और अर्थ के लिए पदाने से लाभ होता है| विज्ञान सुन्दर है क्योंकि यह आपको एक इन्द्रधनुष या एक फूल कि ख़ूबसूरती का कारण समझाता है ,परिभाषाओं के दायरे से बाहर ,और अंको और चिन्हों के परिचालन से ऊपर है वो ज्ञान जो किसी, क्यों ,क्या और कैसे को जन्म देता है | क्षेत्र कला का हो,वाणिज्य या विज्ञान का जरूरत है इस जिज्ञासा को जीवित रखने की, जररूत है हर मनुष्य को जीवन भर विद्यार्थी बनाये रखने की , और जरूरत हैं ज्ञान के साथ सवेंदेना को समन्वित करने की| गांधीजी ने भी "मानवता विहीन विज्ञान ,अंतरात्मा विहीन आनन्द और चरित्र बिना ज्ञान" को समाज मूल बुराईयो में से बताया था |हमारी जरुरत है उष्मा गतिकी के नियमो के साथ ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को समझने की,व्रतीय गति के नियम,अगर एक विद्यार्थी को तेज़ी से मोड़ मुड़ने पर होने वाले खतरों को नहीं समझा पाए तो शिक्षक इसे अपनी असफलता ही माने |
शिक्षा एक साझा प्रयास है, जिसे हम विद्यालयों के जिम्मे छोड़ कर मुक्ति नहीं पा सकते | किसी भी शिशु का पहला स्कूल है उसका घर और पहले शिक्षक उसके अभिभावक | एक बालक के अवचेतन मन पर अभिभावकों द्वारा दी गयी सलाह और उससे जनित प्रतिक्रिया उसके स्मृति पटल पर अंकित होती रहती है | एक व्यसक होने पर वो जीवन को अपने अनुभवों के आधार पर देखता है | हर बच्चा अपना जीवन अपने अभिभावोकों के प्रति प्रेम से शुरू करता है,बड़ा होने पर वो उन्हें परखता है और कभी-कभी उन्हें क्षमा भी कर पाता है | आपकी प्रतिक्राएँ,आपका पोषण एक बचे के चरिर्त्र का निर्माण करते हैं| अपने बचे के पहले कदम किसी भी माता के लिए अविस्मर्णीय पल होते हैं लेकिन जब बालक चलाना सीखते समय गिरता है तो सब माताओं की प्रतिक्रिया एक सी नहीं होती| एक माता अपनी जगह खड़े रहकर अपने बालक को खुद तक आने को प्रेरित करती है जब वो बालक अपनी माँ तक पहुँचता है तब ही उसे दुलार मिलता है ऐसा करके उस अबोध के व्यकित्व में माँ एक बीज बोती है,कि किसी भी कार्य को समाप्त करने पर ही पुरुस्कार मिलता है | दूसरी माँ दौड़कर अपने बचे को गोद में उठाती है और जीवन में हमेशा दूसरों से मदद के अपेक्षा करना सिखाती है | तीसरी माँ न सिर्फ बच्चे को उठाती है, पर उसके साथ फर्श को पीटकर उसे अपने बच्चे को गिरा देने का आरोप भी लगाती है, और यह बालक जीवन में अपनी हर किसी गलती के लिए दूसरों को जिमेदार मनाता है.|
जीवन के सबक संघर्ष से ही आते है , हमें अपने बचों को बड़ा होने का मौका देना चाहिए | शत प्रतिशत अंको की अपेक्षा अमानवीय है | आप एक बचे से गलती करने का हर मौका छीन कर उसे अनुभवों से वंचित करते हैं ,क्या आपने कभी सोचा है की यह बालक जब वयस्क जीवन में कोई असफलता का सामना करेगा तो उस से कैसे उठ पायेगा| जीवन असफलता से उबरकर आने का नाम है , यह हमें समझना होगा|लौईस जौह्नन कहते हैं "मुझे अभिभावकों से मिलना इसलिए पसंद है क्योंकि उन्हें जानने के बाद बचों को माफ़ करना आसान हो जाता है|
कुछ भी गलत न करने देने की प्रवृति ने ही "कोचिंग कल्चर " को एक व्यसायय के रूप में विकसित किया है | आज नर्सरी में पड़ने वाला हर बचा अब्दुल कलाम या सचिन तेंदुलकर बनाना चाहता है इसलिए नहीं की वोः उनकी उपलब्धियों से प्ररित है बल्कि इसलिय की एसा कहना उसे मैडम ने सिखाया है| एक बुद्धिमान शिषक वो है जो एक विद्यार्थी को सवालों की दहलीज पे लाके सोचने का तरीका सिखाये ,मगर इन दिनों क्या सोचना है यह भी शिक्षक सिखाते हैं|यह भूलकर के शिक्षा घड़े को भरना नहीं चिंगारी को जगाने का नाम है|
ज्ञान के साथ सवेंदना का विकास ही संपूर्ण शिक्षा है | समस्याएँ कई है, और समाधान भी कई | जरुरत है एक पहल की जो बस आप कर सकते हैं अपने घर से, अपनी नयी पीड़ी को , एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने की कोशिश के साथ , अगर हम आने वाली पीढयों को एक सभ्य समाज देना कहते हैं तो शिक्षा ही हमारी एक मात्र आशा भी है और हथियार भी...... दुष्यंत कुमार जी की पंकितयां वो सब कहती हैं , जो आखिर में कहना चाहता हूँ :
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है


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