Tuesday, January 5, 2010

क्या हो शिक्षा का उधेश्य ?


गूगल व हिंदुस्तान , ने वेब पर हिंदी को बढावा देने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया था | इस प्रतियोगिता के लिए मैंने "शिक्षा : जीवनशैली या व्ययसाय ?" विषय पर यह लेख लिखा था |सौभाग्य  से इसे  पुरुस्कृत  किया गया . अब क्योंकि KNOL गूगल द्वारा बंद किया जा रहा है इसे यहाँ पोस्ट कर दिया है |


सवाल से शुरू कर रहा हूँ, क्योंकि, इन सवालों में ही कहीं मेरी अज्ञानता छुपी है,और मेरी अज्ञानता का ज्ञान,मेरी प्रेरणा भी है व मेरे लिए शिक्षा का मूल मंत्र भी | 

शिक्षा कई रहस्यों से पर्दा हटाती है और इस प्रक्रिया में कई नए प्रश्नों को जन्म भी देती है | किसी भी तरह कि शिक्षा का आधारभूत ध्येय होना चाहिए, व्यक्ति का बौद्धिक विकास, जो एक मानव को प्रश्नों पर सोचने को बाधित करे, जो एक इंसान को तर्क व विचार से निर्णय लेना सिखाये. क्योंकि यह सिर्फ सोच है, जो एक मनुष्य को,एक प्रशिक्षित पशु से अलग करती है| एक शिक्षा पद्दति का मूल उधेश्य होना चाहिए,श्रेष्ठ नागरिक और अच्छे इंसान बनाना मगर दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा पद्दति केंद्रित है सफल आदमी बनाने में और बकौल ग़ालिब "आसान नहीं आदमी को भी इंसान होना"|

द्रष्टि घुमाकर देखिये , आपके चारों और आपको अशिक्षित डिग्रीधारी मिल जायेंगे | आज के युवक के वाहन चलाने के तरीके में , उसकी अभिवयक्ति ,विचारों और जीवन मूल्यों में आप हमारी शिक्षा पद्दति कि असफलता कि दुर्गन्ध को महसूस कर सकते हैं|.जो शिक्षा जीवन का पर्याय सफल होना और सफलता का मायने अमीर होना सिखाती हो, वह हमें मशीनों को चलाने और बेचने वाले हाथ तो दे सकती है मगर उन मशीनों को बनाने वाला दिमाग नहीं दे सकती | हर मनुष्य जन्म से जिज्ञासु होता है ,मगर समय के साथ जिज्ञासा कि इतिश्री होती है, सब कुछ मान लेने के दुर्भाग्य में, या सब कुछ जान लेने के भ्रम में | मस्तिक्ष कि अँधेरी कन्दाओं में उलझे, विचारों के उलटे चमगादड शब्दों के जाल में आंदोलित तो होते हैं मगर उड़ नहीं पाते , और मानव ,ईश्वर की  सबसे श्रेष्ठ कृति ,एक रोबोट कि तरह परिस्थितयों के लिए गलत प्रोग्रामिंग को जिमेदार बनाकर अपने हर कर्त्तव्य से विमुख हो जाता है |

समयस्याओं से परे हट समाधान कि तरफ आना चाहूँगा,इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट में स्नाकोतर उपाधियाँ लेने के बाद मैं एक शिक्षक हूँ,किसी बाध्यता के कारण नहीं , अपनी मर्जी से,अपनी ख़ुशी से,क्योंकि विद्यार्थियों के बीच बिताये गए घंटे मेरे जीवन को मायने देते हैं | मेरे अवलोकनों , प्रेक्षणों ,प्रयोगों ने जो अनुभव मुझे दिया है उसका निचोड़ ये है कि विषयों को शब्दों के लिए नहीं उनके आशय और अर्थ के लिए पदाने से लाभ होता है| विज्ञान सुन्दर है क्योंकि यह आपको एक इन्द्रधनुष या एक फूल कि ख़ूबसूरती का कारण समझाता है ,परिभाषाओं के दायरे से बाहर ,और अंको और चिन्हों के परिचालन से ऊपर है वो  ज्ञान जो किसी, क्यों ,क्या और कैसे को जन्म देता है | क्षेत्र कला का हो,वाणिज्य या विज्ञान का जरूरत है इस जिज्ञासा को जीवित रखने की, जररूत है हर मनुष्य को जीवन भर विद्यार्थी बनाये रखने की , और जरूरत हैं ज्ञान के साथ सवेंदेना को समन्वित करने की| गांधीजी ने भी "मानवता विहीन विज्ञान ,अंतरात्मा विहीन आनन्द और चरित्र बिना ज्ञान" को समाज मूल बुराईयो में से बताया था |हमारी जरुरत है उष्मा गतिकी के नियमो के साथ ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को समझने की,व्रतीय गति के नियम,अगर एक विद्यार्थी को तेज़ी से मोड़ मुड़ने पर होने वाले खतरों को नहीं समझा पाए तो शिक्षक इसे अपनी असफलता ही माने | 

शिक्षा एक साझा प्रयास है, जिसे हम विद्यालयों के जिम्मे छोड़ कर मुक्ति नहीं पा सकते | किसी भी शिशु का पहला स्कूल है उसका घर और पहले शिक्षक उसके अभिभावक | एक बालक के अवचेतन मन पर अभिभावकों द्वारा दी गयी सलाह और उससे जनित प्रतिक्रिया उसके स्मृति पटल पर अंकित होती रहती है | एक व्यसक होने पर वो जीवन को अपने अनुभवों के आधार पर देखता है | हर बच्चा अपना जीवन अपने अभिभावोकों के प्रति प्रेम से शुरू करता है,बड़ा होने पर वो उन्हें परखता है और कभी-कभी उन्हें क्षमा भी कर पाता है | आपकी प्रतिक्राएँ,आपका पोषण एक बचे के चरिर्त्र का निर्माण करते हैं| अपने बचे के पहले कदम किसी भी माता के लिए अविस्मर्णीय   पल होते हैं लेकिन जब बालक चलाना सीखते समय गिरता है तो सब माताओं की प्रतिक्रिया एक सी नहीं होती| एक माता अपनी जगह खड़े रहकर अपने बालक को खुद तक आने को प्रेरित करती है जब वो  बालक अपनी माँ तक पहुँचता है तब ही उसे दुलार मिलता है ऐसा करके उस अबोध के व्यकित्व में माँ एक बीज बोती है,कि किसी भी कार्य को समाप्त करने पर ही पुरुस्कार मिलता है | दूसरी माँ दौड़कर  अपने बचे को गोद में उठाती है और जीवन में हमेशा दूसरों से मदद के अपेक्षा करना सिखाती है | तीसरी माँ न सिर्फ बच्चे  को उठाती है, पर उसके साथ फर्श को पीटकर उसे अपने बच्चे  को गिरा देने का आरोप भी लगाती है, और यह बालक जीवन में अपनी हर किसी गलती के लिए दूसरों को जिमेदार मनाता है.| 

जीवन के सबक संघर्ष से ही आते है , हमें अपने बचों को बड़ा होने का मौका देना चाहिए | शत प्रतिशत अंको की अपेक्षा अमानवीय है | आप एक बचे से गलती करने का हर मौका छीन कर उसे अनुभवों से वंचित करते हैं ,क्या आपने कभी सोचा है की यह बालक जब वयस्क जीवन में कोई असफलता का सामना करेगा तो उस से कैसे उठ पायेगा| जीवन असफलता से उबरकर आने का नाम है , यह हमें समझना होगा|लौईस जौह्नन कहते हैं "मुझे अभिभावकों से मिलना इसलिए पसंद है क्योंकि उन्हें जानने के बाद बचों को माफ़ करना आसान हो जाता है|

कुछ भी गलत न करने देने की प्रवृति ने ही "कोचिंग कल्चर " को एक व्यसायय के रूप में विकसित किया है | आज नर्सरी में पड़ने वाला हर बचा अब्दुल कलाम या सचिन तेंदुलकर बनाना चाहता है इसलिए नहीं की वोः उनकी उपलब्धियों से प्ररित है बल्कि इसलिय की एसा कहना उसे मैडम ने सिखाया है| एक बुद्धिमान शिषक वो है जो एक विद्यार्थी को सवालों की दहलीज पे लाके सोचने का तरीका सिखाये ,मगर इन दिनों क्या सोचना है यह भी शिक्षक सिखाते हैं|यह भूलकर के शिक्षा घड़े को भरना नहीं चिंगारी को जगाने का नाम है| 

ज्ञान के साथ सवेंदना का विकास ही संपूर्ण शिक्षा है | समस्याएँ कई है, और समाधान भी कई | जरुरत है एक पहल की जो बस आप कर सकते हैं अपने घर से, अपनी नयी पीड़ी को , एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने की कोशिश के साथ , अगर हम आने वाली पीढयों को एक सभ्य समाज देना कहते हैं तो शिक्षा ही हमारी एक मात्र आशा भी है और हथियार भी...... दुष्यंत कुमार जी की पंकितयां वो   सब कहती हैं , जो आखिर में कहना चाहता हूँ :


यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है, 
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार, 
अब तो पथ यही है



Sunday, November 8, 2009

कतरने सच की

एक बड़ा सच झूमता , खिलखिलता हुआ
उन्माद, आगोश मे लिए उड़ना चाहता है
आवेश, आवेग ,रफ़्तार पसंद है इसको

और एक बड़ा सा सच चुपचाप दबा सा कोने में
पसरा सड़क पर, बुझता है  हलवाई की भटिओं में
धुलता है रोज़ चाय के झूठे गिलासों के साथ

एक सच दूसरे सच को निगलाना चाहता है

और कई छोटे  सच टकराते हैं  राहों में
कुछ तड़पते   हैं, शब्दों की ज़ंजीरों में
और कुछ बैठ जाते हैं मेरे सिरहाने
घोलने खुली आँखों में, जिंदगी का नमक


हिन्दी कविता में ये मेरे जीवन की पहली कोशिश है
आपकी प्रतिक्रिया बेहतर होने में यकीनन  मेरी मदद करेगी


कुछ सच यह भी ......बुझे से हैं पर  .......जलते हैं







Sunday, October 25, 2009

"sahir" the magic


25 अक्टूबर 1980 वो तारीख थी जब इस देश के एक अजीम शायर ने अपने जीवन  की आखिरी साँसे ली , साहिर लुधियानवी  के नाम को किसी के परिचय की जरूरत नहीं  ।
 कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे  मगर शायद कई लोग इस हकीकत  से वाकिफ नहीं होंगे ,कि  लुधियाना के जिस  कॉलेज से  प्रेम के जुल्म में , साहिर को  अमृता प्रीतम  के पिता के कहने पर निकाल दिया गया था उसी  कॉलेज ने  उन्हें ख्याति मिलने के बाद समानित किया  । शायद यही जीवन है जहाँ चदते हुए सूरज की पूजा होती है , और मरने के बाद सैनिको को शहीद कहके सलाम किया जाता है  ।साहिर की  प्रतिभा शायद इन्ही अनुभवों से गुजर कर  तल्खियाँ  के रूप में सामने आई । 'तल्खियाँ' यानि कड़वाहट , और  उनके जीवन के तल्ख़ अनुभव   इनके लिखे शेरों में साफ़  झलकती है ।शायद इसी लिए वो लिखते हैं
मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है
मगर ऐ काश! देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को
मैं जब तारों पे नज़रें गाड़कर आसूँ बहाता हूँ
तसव्वुर बनके भूली वारदातें याद आती हैं
तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्दत से पहरों तिलमिलाता हूँ
मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत के नज़्ज़ारों से उल्फ़त है
मेरा दिल दुश्मन-ए-नग़्मा-सराई हो नहीं सकता
मुझे इन्सानियत का दर्द भी बख़्शा है क़ुदरत ने
मेरा मक़सद फ़क़त शोला नवाई हो नहीं सकता
जवाँ हूँ मैं जवानी लग़्ज़िशों का एक तूफ़ाँ है
मेरी बातों में रंगे-ए-पारसाई हो नहीं सकता
मेरे सरकश तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है
कि जब मैं देखता हूँ भूख  के मारे किसानों को
ग़रीबों को, मुफ़्लिसों को, बेकसों को, बेसहारों को
सिसकती नाज़नीनों को, तड़पते नौजवानों को
किसी के चिथडों को और शंशाही खाज्नाओं को 
तो दिल ताबे-इ-निशाते बज्मे इशरत हो नहीं सकता 
मैं चाहूं   भी तो ख्वाब और तराने गा नहीं सकता  

ऐसी सोच सिर्फ ऐसा इंसान रख सकता था जिसका मजहब  इंसानियत हो और जिससे इस बात का एहसास हो की सरहद के उस पर रहने वाले इंसानों का  खून भी उसी रंग का जैसा की हमारा ,
ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे- तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है
इसलिए ऐ शरीफ इंसानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।

क्रांति उनकी फितरत में थी जो उनकी हर रचना में नुमाया होती है , ताजमहल की तारीफ में तो कई कवियों और रचनाकारों ने बहुत लिखा मगर सिर्फ  साहिर की नज़र ने  देखा की एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर गरीबों की मोहब्बत का मजाक उडाया है  , वो लिखते हैं 
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे
बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उलफत भरी रूहों का सफर क्या मानी
अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिये तश्शीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह गरीब  थे
साहिर  को हमारी पीड़ी सिर्फ उनके फ़िल्मी गीतों की वज़ह से जानती है, इसमें कोई शक नहीं के उन्होंने बहुत खूबसूरत गीत लिखे मगर उनके शब्दों में "फिल्म मैं गीत लिखना क्या बड़ी बात है एक सिगरेट जलालकर उसके दस कश लेता हूँ तो एक गीत बन जाता है. मेरे एक कश की कीमत एक हज़ार रुपये है.
ऐसे  लोग बार बार नहीं आते , कितने दुःख की बात है की आज २४ घन्टे संगीत  बजाने वाले किसी FM   चैनल में साहिर को श्रदांजलि देने को दो मिनट नहीं है ,शायद साहिर को तीस साल पहले इसका एहसास होगा जब उन्हाने लिखा
कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले ।
कल कोई मुझ को याद करे, क्यों कोई मुझ को याद करे
मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बरबाद करे ॥
आये तो बहुत हैं, मगर बेहतर तो होना शायद मुमकिन नहीं ,कवि वही कहता  है जो वो देखता और महसूस करता है ,बाज़ार महसूस नहीं करता और  अब सिर्फ बाज़ार का महत्व है और  बाजारों   में भावनाओं    का मूल्य शायद कुछ  भी  नहीं , साहिर के बारे में बस यही कहा जा सकता है
हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
एक तू ही नहीं है
नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं
ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं
कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है
हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है
हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है
तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है
हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है
यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है
यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है

Tuesday, October 13, 2009

एक कविता

नीरजजी की इस कविता ने हमेशा से मुझे बहुत प्रबावित किया है , क्योंकि यह मुझे इंटरनेट पे कहीं नहीं मिली, तो मैंने सोचा मैं ही इसे publish करुँ ताकि आप भी इन भावनाओं को महसूस कर सकें ...............

हर सुबह जगाने वाले, हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना  जग में, तो फिर मुझे नयन मत देता

जिस दरवाज़े गया ,मिले बैठे अभाव, कुछ बने भिखारी
पतझर के घर, गिरवी थी ,मन जो भी मोह गई फुलावारी
कोई था बदहाल धुप में, कोई था गमगीन छावों में
महलों से कुटियों तक थी सुख की दुःख से रिश्तेदारी
हर खेल खिलाने वाले , हर रस रचाने वाले
घुने खिलोने थे जो तेरे, गुडियों को बचपन मत देता

गीले सब रुमाल अश्रु की पनहारिन हर एक डगर थी
शबनम की बूदों तक पर निर्दयी धुप की कड़ी नज़र थी
निरवंशी थे स्वपन दर्द से मुक्त था कोई भी आँचल
कुछ के चोट लगी थी बाहर कुछ के चोट लगी भीतर थी
बरसात बुलाने वाले बादल बरसाने वाले
आंसू इतने प्यारे थे तो मौसम को सावन मत देता

भूख़ फलती थी यूँ गलियों में , ज्यों फले योवन कनेर का
बीच ज़िन्दगी और मौत के फासला था बस एक मुंडेर का
मजबूरी इस कदर की बहारों में गाने वाली बुलबुल को
दो दानो के लिए करना पड़ता था कीर्तन कुल्लेर का
हर पलना झुलाने वाले हर पलंग बीछाने वाले
सोना इतना मुश्किल था, तो सुख के लाख सपन मत देता

यूँ चलती थी हाट की बिकते फूल , दाम पाते थे माली
दीपोंसे ज्यादा आमिर थी , उंगली दीप भुजाने वाली
और यहीं तक नहीं , आड़ लेके सोने के सिहांसन की
पूनम को बदचलन बताती थी अमावास की रजनी काली
हर बाग़ लगाने वाले हर नीड़ लगाने वाले
इतना था अन्याय जो जग में तो फिर मुझे विनम्र वचन मत देता

क्या अजीब प्यास की अपनी उमर पी रहा था हर प्याला
जीने की कोशिश में मरता जाता था हर जीने वाला
कहने को सब थे सम्बन्धी , लेकिन  आंधी के थे पते
जब तक परिचित हो आपस में , मुरझा जाती थी हर माला
हर चित्र बनने वाले, हर रास रचाने वाले
झूठे थी जो तस्वीरें तो यौवन को दर्पण मत देता

हर सुबह जगाने वाले हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना जग में तो फिर मुझे नयन मत देता