Sunday, November 8, 2009

कतरने सच की

एक बड़ा सच झूमता , खिलखिलता हुआ
उन्माद, आगोश मे लिए उड़ना चाहता है
आवेश, आवेग ,रफ़्तार पसंद है इसको

और एक बड़ा सा सच चुपचाप दबा सा कोने में
पसरा सड़क पर, बुझता है  हलवाई की भटिओं में
धुलता है रोज़ चाय के झूठे गिलासों के साथ

एक सच दूसरे सच को निगलाना चाहता है

और कई छोटे  सच टकराते हैं  राहों में
कुछ तड़पते   हैं, शब्दों की ज़ंजीरों में
और कुछ बैठ जाते हैं मेरे सिरहाने
घोलने खुली आँखों में, जिंदगी का नमक


हिन्दी कविता में ये मेरे जीवन की पहली कोशिश है
आपकी प्रतिक्रिया बेहतर होने में यकीनन  मेरी मदद करेगी


कुछ सच यह भी ......बुझे से हैं पर  .......जलते हैं







7 comments:

  1. Behtareen rachna,bahut bahut saadhuvaad,agar aapki pratham rachnaa aisi he to fingers crossed for more...

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  2. चाईल्ड लेबर पर लिखी अच्छी संबेदनशील कविता ।

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  3. ऋषभ सच में मुझे कविता की बिल्कुल समझ नहीं है विचार आते हैं मगर उन्हे कैसे व्यस्थित किया जाए यह सीखने में शायद समय लगे ,तारीफ से यह है की हिम्मत बँधी रहेगी
    vinayji, तहे दिल से धन्यवाद आपके कॉमेंट के लिए और हौसला बड़ाने के लिए

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  4. सुनील जी अगर यह आपकी पहली कविता है तो ---
    बहुत खूब लिखा है

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  5. mast abhivaktiya likhta hai mind refresh ho jata hai,

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  6. sundar aur savendansheel hai sir
    aur likhye

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  7. आप द्वारा प्रस्तुत चित्र अपनी पूरी कहानी सुनते लगते हैं...इतने जीवंत चित्र...उफ़...आपकी नयी रचना की तरह...बधाई स्वीकार करें.
    नीरज

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